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Publishing Year : 2024

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Shri Rawatpura Sarkar Maharaj is synonym of socio-spiritual movement in Central India, he has made significant contributions in education, aiming to empower individuals and communities through knowledge and skill development. This research paper explores the educational initiatives undertaken by Shri Rawatpura Sarkar Maharaj examining their impact on access to education, quality enhancement, and holistic development. Through a comprehensive analysis of primary and secondary sources, this paper elucidates the strategies, outcomes, and challenges faced by Shri Rawatpura Sarkar Maharaj in its pursuit of educational excellence in Central India.

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Educational Excellence, Educational Initiatives, Marginalized Communities.

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  1. Diwedi, Himanshi, (2010) Lau, Dhawal Associate, Raipur (C.G.), p15-295. 

2. Kundewhawar, Manjul. (2009) Dwitiyo Nasti, 4th Ed. Shri Rawatpura Sarkar Lok Kalyan Trust, Rawatpura dham, bhind (M.P), p10-343.
3. Kundewhawar, Manjul  (2011) Sambhawami yuge yuge. Shri Rawatpura Sarkar Lok Kalyan Trust, Rawatpura dham, bhind (M.P), p 24-380.
4. Saxena, Amita & Saxena,Arpita, (2013) Bliss of Divine Gurudev. Shri Rawatpura Sarkar Lok Kalyan Trust, Rawatpura dham, bhind (M.P), p11-103
5. Shri Ravi Ratnakar, (2015) Shri Rawatpura Sarkar Lok Kalyan Trust, Rawatpura dham, bhind (M.P).
6. Sharma,Kausal,  (2011) Alakh, Shri Rawatpur Sarkar Lok Kalyan Trust, p 37-120.
7. http://shrirawatpurasarkar.org/MaharajShri/Literature.aspx  Assess on 13/01/2024.

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Microfinance Institutions (MFIs) is playing very crucial role in economic development of India. Microfinance is a very important source of obtaining financial services for those people and micro enterprises that do not have easy access to commercial banks and other financial institutions. Microfinance does not only fulfill the shortage of physical capital amongst the poor but also creates social awareness among corporate level to marginalized market segment of the society. It gives services such as loans, deposit facilities, payment related services, money transfers, insurance to poor and low income households and for their micro enterprise. This research article throws light on the role and current status of microfinance in Indian perspectives.

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Microfinance, Microcredit, Financial Inclusion, Entrepreneurs.

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  1. Chaudhary P. and Kumari Rubi, (2009) “Micro Finance : Ray of Hope for Hopless” Jharkhand Journal of Social Development, Vol 2.

2. Bansal, Hema, (2003) “SHG-Bank Linkage Program in Indian : An Overview”, Journal of Microfinance, Vol. 5, Number I.
3. Sayeed Sadaf, Times of India, March 11, (2023) “How microfinance can help in the emergence of India as an economic superpower.” 
4. Status of Microfinance in India Report 2022-23, NABARD. 
5. Vaidyanathan Committee Report 2005.
6. Bharat Microfinance Report 2020.
7. Sa-Dhan, (2012), Financial Inclusion: A study on the efficacy of banking correspondent model. Delhi: City Foundation.
8. Sa –Dhan, (2022), The Bharat Microfinance Report 2022.
9. http://www.investopedia.com/terms/m/microfinance.asp, Assess on February 25, 2024.

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प्रत्येक देश की आधी आबादी महिलाओं पर आधारित होती हैं। समाज के विकास के लिये महिलाओं को सशक्त बनाने की आवश्यकता है, परंतु शि़क्षा से बंचित वर्गों में पूरे भारत में सबसे बडा हिस्सा महिलाओं का है। भारत एक विकासशील देश हैं जिसकी 70 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती हैं। भारतीय ग्रामीण महिलाओं की स्थिति आज भी सोचनीय हैं इसी बात को ध्यान में रखते हुये केंद्र एवं राज्य सरकारों ने ग्रामीण महिलाओं की सामाजिक एवं आर्थिक स्तर को ऊॅचा उठाने तथा उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिये विभिन्न योजनायें जिसमें प्रधानमंत्री रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा), प्रधानमंत्री आवास योजना, प्रधानमंत्री अन्त्योदय योजना, प्रधानमंत्री समर्थ योजना आदि सम्मिलित हैं। ग्रामीण महिलाओं का अधिकांश समय घर के कार्यों में व्यतीत होता है जिसमें भोजन पकाना, परिवार के सदस्यों की देखभाल मुख्य रूप से शामिल है। भारतीय ग्रामीण महिलाओं का ज्यादा समय ईधन की व्यवस्था करने में जाता हैं। आज भी ग्रामीण परिवारों में भोजन पारम्परिक रूप से चूल्हों पर पकाया जाता हैं तथा ईंधन इकट्टा करने की अधिकांश जिम्मेदारी महिलाओं पर होती हैं भोजन पकाने के लिये परम्परागत ईधन जैसे लकडी गोबर के उपले (कण्डे), मिटटी का तेल, कोयला आदि पर निर्भर हैं। अशुद्ध ईंधन का प्रयोग करने से महिलाओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पडता हैं जिससे उन्हें विभिन्न बीमारियों का सामना करना पडता हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष 5 लाख मृत्यु अस्वच्छ ईंधन के प्रयोग से होती है। उज्जवला योजना से महिलाओं को धुॅआ रहित वातावरण में भोजन पकाने की सुविधा मिली है। इससे उनका स्वास्थ्य बेहतर हुआ हैं और ईंधन संग्रह करने में लगने वाले समय की भी बचत हुई हैं। इस समय का उपयोग महिलायें अपनी आय बढ़ाने और सामाजिक कार्यों के लिये कर सकती है। इस योजना को लागू करने से महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा मिलेगा और महिलाओं के स्वास्थ्य की भी सुरक्षा की जा सकती है। उज्जवला योजना के लागू होने के बाद वातावरण प्रदूषण में भी कमी आने की सम्भावना हैं। इस प्रकार यह योजना महिलाओं और बच्चों को स्वस्थ्य रखने में सहायक सिद्ध होगी जबकि अत्यधिक संख्या में भोजन पकाने वाली महिलायें श्वांस संबंधी बीमारियों से ग्रसित हो जाती है।ं (रमन देवी 2017) एक अध्ययन के अनुसार लकडी गोबर के उपले (कण्डे) जैसे पारम्परिक ईंधन के प्रयोग करने से एक घण्टे में 400 सिगरेट पीने जितना नुकसान भोजन पकाने वाले व्यक्ति को होता हैं।  स्वास्थ्य के जानकार कहते हैं कि लकडी आदि जलने से उठने वाले धुॅऐ में हानिकारक प्रभाव डालती हैं और पर्यावरण को भी प्रदूषित करती है। महिलाओं की समस्याऐं और उनके प्रयोग से होने वाले हानिकारक प्रभावों को ध्यान में रखते हुये प्रधानमंत्री ने 01 मई 2016 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से प्रधानमंत्री उज्जबला योजना का शुभारंभ किया। यह योजना एक धुॅआ रहित ग्रामीण भारत की परिकल्पना करती हैं और वर्ष 2019 तक 5 करोड परिवारों, विशेषकर गरीबी रेखा से नीचे रह रही महिलाओं को रियायती एल.पी.जी कनेक्शन उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखती हैं। उज्जवला योजना का लाभ लेने के लिये लाभार्थी को राशन कार्ड में जितने सदस्यों का नाम है सभी का आधार कार्ड होना चाहिये। उनके पास पहले से कोई कनेक्शन नही होना चाहिये। आवेदक का नाम 2011की ैम्ब्ब् सामाजिक सूची में होना चाहिये व बीपीएल राशनकार्ड धारी होना चाहिये। प्रधानमंत्री उज्जवला योजना10 अगस्त 2021 को फिर से शुरूआत की गई। 2‘0 के तहत और 75 लाख नये एलपी.जी. कनेक्शन देगी। यह उज्जवला योजना के तहत ये कनेक्शन 3 साल यानि 2026 तक दिया जायेगा।

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स्वास्थ्य, पर्यावरण, ईंधन, स्कूल सशक्तिकरण.

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  1. प्रधानमंत्री उज्जवला योजना प्रभाव आंकलन- अटल विहारी बाजपेयी सुशासन एवं नीति विश्लेषण संस्थान भोपाल मध्यप्रदेश

2. एस. अग्रवाल, एस. कुमार एण्ड एम. के तिवारी- (2018) - डिसीजन सपोर्ट सिस्टम फॉर प्रधानमंत्री उज्जवला योजना।
3. राजनाथ राम और शाफकत मुबारक (2018) - प्रधानमंत्री उज्जवला योजना,ग्रामीण महिलाओं की जिन्दगी।
4. प्रधानमंत्री उज्जवला योजना- सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार।
5. अग्रवाल एस. कुमार, एस. और तिवारी एम. के. (2018) प्रधानमंत्री उज्जवला योजना के लिये निर्णय समर्थन प्रणाली। 
6. देवी आर. 2017 प्रधानमंत्री उज्जवला योजना मुददे और चुनौतियॉ इंटरनेशनल जर्नल ऑफ ऐकेडमिक रिसर्च एण्ड डेव्हलपमेंट। 

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भारत में विविधता में एकता सदैव विधमान रही है। इसकी संस्कृति उदार है, क्योकि भारतीय संस्कृति में प्रत्येक जीवजन्तु, पशु-पक्षी को अपनाया गया है, और सदव्यवहार की बात कही गयी है। भारतीय समुदाय पशु-पक्षी, पेड़-पैधे, जीव-जंतु समेत शारीरिक व मानसिक दिव्यांगो को सहजता से अपनाता है, और उनका पालन-पोषण करता है। किन्तु सिर्फ लिंग भेद होने के कारण किसी इंसान को तृतीय लिंग के रूप में उनके परिवार व समाज द्वारा बहिष्कृत कर दिया जाता है जिसके बाद दर-दर की ठोकरे खाने व अपमान जनक जिंदगी जीने को वे विवश हो जाते है। उन्हें ऐसा कोई अधिकार नही मिल पाता है जिसका एक मानव प्राणी हक़दार है, जिसे मानवधिकार कहा जाता है। तृतीय लिंग को भी पांच मूल-भुत आवश्यकताओं भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा और चिकित्सा के साथ-साथ रोजगार, समानता और सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार बिना किसी भेद-भाव के प्राप्त होना चाहिए। वर्तमान समय में तृतीय लिंग का मुद्दा सिर्फ सामाजिक या स्वास्थय का मुद्दा नही है, बल्कि यह मानवाधिकार का और संवेदनशील मुद्दा है।

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तृतीय लिंग मानवाधिकार, प्रसंविदा, अनुच्छेद, अधिनियम.

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  1. मोहन, आर. (2022), तृतीय लिंग समुदाय के स्वास्थ संबंधी संघर्ष का समाजशास्त्रीय विश्लेषण, शोध समागम, 3(4), 418।

2. मोहन, आर. (2021) किन्नरों के मानवाधिकार और सामाजिक विकास, सुबह की धूप, पृ. 26-28।
3. Transgender/others- Census 2011 India, Retrived from https://www-census2011-co-in.translate.goog/transgender.php?_x_tr_sl=en&_x_tr_tl=hi&_x_tr_hl=hi&_x_tr_pto=tc
4. अभिषेक, अ. (2021) किन्नर एवं उनके मानवाधिकार, बोहल शोध मंजूषा, किन्नर महा विशेषांक, 758 -761।
5. उप्रेती, प. (nd). थर्ड जेंडर को समान अधिकारों के साथ समान नजरिया भी चाहिए.: https://hindi.news18.com/blogs/prakash-upreti/transgender-needs-equal-rights-and-views-3217762.html
6. साबत, एस.एन. (2015) भारत में मानवाधिकार रूवैदिक काल से आधुनिक काल तक, नई दिल्ली राधाकृष्ण प्रकाशन।
7. अग्रवाल, एच. ओ. (2021), मानवधिकार, प्रयागराज, सेंट्रल लॉ पब्लिकेशन, पृ. 287।
8. साबत, एस.एन. (2015) भारत में मानवाधिकारः वैदिक काल से आधुनिक काल तक, नई दिल्ली राधाकृष्ण प्रकाशन।
9. साबत, एस.एन. (2015) भारत में मानवाधिकारः वैदिक काल से आधुनिक काल तक, नई दिल्ली राधाकृष्ण प्रकाशन।
10. गुप्ता एस. (2022). भारत में ट्रांसजेंडर के अधिकार क्या हैं. Retrieved from Pleaders: https://hindi.ipleaders.in/what-are-the-powers-of-the-transgender-in-india/
11. LONDUN (2014). भारतीय सर्वाच्च न्यायालय ने स्व-पहचान के अधिकार को तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दी. Retrieved from इक्वल राइट्स ट्रस्ट : https://www-equalrightstrust-org.translate.goog/news/indian-supreme-court-recognises-right-self-identify-third-gender?_x_tr_sl=en& _x_tr_tl=hi&_x_tr_hl=hi&_x_tr_pto=tc,sc
12. ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) बिल, 2019, PRS LEGISLATIVE RESEARCH, Retrived from https://hi.prsindia.org/billtrack/%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4 %82%E0%A4%B8%E0%A4%9C%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%B0-%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BF-%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8 B%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4% B0%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%A3-%E0%A4%AC%E0%A4 %BF%E0%A4%B2-2019 
13. सिंह, ए. (2022). भारत में पहली बार ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए शुरू की गई ैडप्स्म् योजना, स्वास्थ्य बीमा से लेकर स्कॉलरशिप तक का मिलेगा लाभ.Retrieved from Knocksense Hindi: https://www.knocksense.com /hindi/smile-scheme-for-transgenders-and-beggers
14. कर्नाटक सभी सरकारी सेवाओं में ट्रांसजेंडरों को आरक्षण देने वाला भारत का पहला राज्य बना. Retrieved from dhyeyaias: https://www.dhyeyaias.com/hindi/current-affairs/daily-current-affairs/karnataka-becomes-first-state-in-india-to-provide-reservation-to-transgenders-in-all-government-services
15. शर्मा एच. (2022). मध्य प्रदेश सरकार का बड़ा फैसला अब सरकारी य़ोजनाओं का लाभ और नौकरी के लिए पात्र हुए थर्ड जेंडर Retrieved from. Patrika: https://www.patrika.com/bhopal-news/third-gender-eligible-for-government-jobs-and-scheme-7514427/  
16. सिंह, जे. (2022) ज्ंजं ैजममस रू ट्रांसजेंडरों को नौकरी दे रुढ़िवादिता को ऐसे तोड़ रही टाटा स्टील, आप भी जान हैरान रह जाएंगे, Retrieved from. Jagran: https://www.jagran.com/jharkhand/jamshedpur-tata-steel-is-breaking-the-stereotype-by-giving-jobs-to-transgenders-22485975.html
17. Youtube
18. एएमएपी, (2022). थर्ड जेंडर को मिले नौकरियों में आरक्षण, देश की पहली ट्रांसजेंडर न्यायाधीश ने की मांग, Retrieved from. Apkaakhbar: https://apkaakhbar.in/reservation-for-third-gender-in-jobs-countrys-first-transgender-judge-demands/
19. स्त्रीकाल डेस्क,(2018). पहली ट्रांसजेंडर स्टूडेंट (पंजाब विश्वविद्यालय) के संघर्ष की कहानी,Retrieved from streekaal: https://streekaal.com/2018/05/dhananjay-the-transgender-activist-and-studen/amp/
20. गुप्ता, एस. (2022) ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम,2019 Retrieved from hindi.ipleaders: https://hindi.ipleaders.in/the-transgender-persons-protection-of-rights-act-2019/

 


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वाण के विवरण से पता चलता है कि वेदों तथा वेदांगों का सम्यक् अध्ययन होता था। हुएनसांग ने पंचविद्याओं-शब्द विद्या (व्याकरण), शिल्पस्थान विद्या, चिकित्सा विद्या, हेतु विद्या (न्याय अथवा तर्क) तथा अध्यात्मक विद्या, का उल्लेख किया है। जयदेव ने हर्ष को भास, कालिदास, वाण, मयूर आदि कवियों की समकक्षता में रखते हुये उसे ‘कविताकामिनी का साक्षत् हर्ष’ निरूपित किया है। ब्राह्मणों को एवं अन्य धार्मिक संप्रदायों को बड़े पैमाने पर भूमि-अनुदान की परंपरा जो गुप्त काल में शुरू हुई थी वो हर्ष के समय में और बढ़ गई एवं इसके बाद के कालों में लगातार बढ़ती ही गई।

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हर्ष वर्धन, संप्रदाय, सांस्कृतिक.

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  1. कूमार, संतोष दास (1980) प्राचीन भारत का आर्थिक इतिहास, बोहरा पब्लिकेशन, इलाहाबाद।

2. चंद्र, विमल पाण्डेय (1980) प्राचीन भारत का इतिहास, शिक्षा प्रकाशन, मेरठ।
3. शर्मा, रामशरण (2010) भारत में राजनीतिक विचार एवं संस्थाएॅ, राजकमल प्रकाशन, इलाहाबाद।
4. पाठक, रश्मि (2003) प्राचीन भारत का सामाजिक इतिहास, अर्जुन पब्लिकेशन, हाउस दिल्ली।
5. सिंह, रामवृक्ष (1982) गुप्तोतर कालीन, राजवंश प्रकाशन, उत्तर प्रदेश, इलाहाबाद।
6. पाण्डेय, राजबल (2000) प्राचीन भारत, विश्वविद्यालय प्रकाशन, उत्तर प्रदेश, वाराणसी

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हमारे देश में सब्जियों का उत्पादन लगभग 72 लाख हे. क्षेत्रफल से 116 मीलियन टन के आस-पास होता है। एफ.ओ. के अनुसार भारतीय आहार में सब्जियां की पूर्ति करने के लिए 2025 तक यह उत्पादन 1600 मीलियन टन तक बढ़ाया जाना जरूरी है। सब्जियों के उत्पादन की वर्षिक विकास दर 2.6 प्रतिशत है जो कम है और लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए 4 प्रतिशत की दर से वृद्धि की आवश्यकता है। एक प्रगतिशील और स्थिर  कृषि विकास के लिए गुणवŸा के बीज महत्वपूर्ण और बुनियादी निवेश है। राष्ट्रीय बीज नीति 2001 और वीज विधेयक 2004 उदारी कृत आर्थिक वातावरण में तेजी से बीज उधोग वृद्धि के लिए पर्यापत ढ़ाँचा प्रदान करता है। अभी तक के रिर्पोट से पता चलता है कि केवल 20 प्रतिशत से कम भारतीय किसान गुणवŸा पूर्ण बीज का उपयोग करने की स्थिति में है। सब्जियों की खेती को उसके उद्देश्य, उगाने के ढ़ग एवं बेचने के आधार पर विभिन्न वर्गो में विभाजित किया जा सकता है। बीज उत्पादन के लिए सब्जियों की खेती, बाग द्वारा सब्जियों की खेती, संसाधनों के लिए सब्जियों की खेती, बाजार के लिए सब्जियों की खेती।

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सब्जियाँ, उत्पादन, लाभकारी, कृषि उद्यम.

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  1. शर्मा, राजीव (2007) प्रकृति द्वारा स्वास्थ्य सब्जियां, डायमंड बुक डिपो, मेरठ।

2. दुबे एवं विवेक (2012) सब्जियों की खेती एवं पुस्पोत्पादन, भारती भण्डार, प्रकाशन, मेरठ।
3. मण्डल, सुनील कुमार (2009) सब्जियों के प्रमुख कीट रोग एवं प्रबंधन, बायोटेक पब्लिकेशन्स, दरियागंज, दिल्ली।
4. बागवानी विभाग, (2019) बागवानी भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, बेगलूरू।
5. चौरसिया, सूर्यनाथ (2015) सब्जी पाठशाला, भा. कृ. अनु. प., वाराणसी, उ.प्र.।

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In this research paper, on the basis of the observation, the researcher has highlighted how people in general use social media. While explaining the modus operandi of social media use, the researcher has provided ideas supported by appropriate arguments that how social media can be used in a constructive and creative way for the benefit of self and society. The researcher has also discussed some destructive and shrewd use of social media by some ill mentality people.

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Social Media, People, Society.

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  1. Boulianne, Shelley. (2015) "Social media use and participation: A meta-analysis of current research." Information, communication & society 18.5, 524-538.

2. Carr, Caleb T., and Rebecca A. Hayes. “Social media: Defining, developing, and divining.” Atlantic journal of communication 23.1 (2015): 46-65.
3. Kaplan, Andreas M., and Michael Haenlein. “Users of the world, unite! The challenges and opportunities of Social Media.” Business horizons 53.1 (2010): 59-68.
4. Miller, Daniel, et al. (2016) How the world changed social media. UCL press.
5. Whiting, Anita, and David Williams. (2013) "Why people use social media: a uses and gratifications approach." Qualitative market research: an international journal 16.4, 362-369.
 

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Value education refers to the learn of development of needful values in people. Values are self-demanding, self sacrificing but not based on impulsive act. Value education, according to one more view, is gradually a matter of educating the feelings and emotions. It is the preparation ‘of the heart’ and comprises in fostering the right sentiments and feelings. The review will be led the goals are to concentrate on the distinction of significant worth mindfulness among young men and young ladies understudies and to concentrate on the distinction of significant worth mindfulness among rustic and metropolitan understudy. There was important to choose the examples from the populace. A sample of 120 students of IX class at the secondary school will be choose by using stratified random sampling method from four schools in Domkal block of Murshidabad district which has two were urban areas and the other two were rural areas. The null hypothesis tested for significance in the results section has open interpreted in tends of rejection and acceptance. The current study found that the significant difference with respect to the value awareness of secondary school student in relation to their gender and locale variation. The boys and girls showed insignificant difference in value awareness in gender variation. But there was significant difference between locale variations. Urban students showed significant variation in value awareness than rural students. So there is no significant difference in value awareness between boys and girls, but significant difference in value awareness between urban areas and rural areas students.

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Value, Awareness, Secondary, School, Student, Gender, Locale. 

Read Reference

  1. Baker, S. J. (1999), A study of effectiveness of traditional experience based and composite approach to value education in developing a set of values in pupils, Ph.D. Thesis, Shivaji University.

2. Bandiste, D. D. (1999), Humanist values: A source book, Delhi, BR Publishing corporatins.
3. Chakraborty, S.K. (1999), Values on ethics for organisations: Theory and practice, New Delhi; Oxford University Press.
4. Das, M.S. & Gupta, V.K. (1995), Social values among young adults: A changing scenario, New Delhi: M.D. Publications.
5. Dutt, N. K. in Ruhela Sp (Ed-1986); Human values and Education, Sterling Publishers pvt. Ltd. New Delhi, Bangalore.
6. Kapur , K and Vaidya, S. (2004) How to Nurture Value Based Education in school, Perspective in Education, Vol. 20, pp 92-99.
7. Mascarenhas, M. & Justa, H. R. (1989), Value Education in schools and other essay, Delhi: Konarak Publishers Pvt. Ltd.
8. Ruhela, S. P. (1986), Human values and education, New Delhi.
9. Sharma, N. (1998), Value creators in education, New Delhi, Regency Publications.
10. Soni, R. B. L. (2003), ‘Inculcating values through voluntary action’ Journal of Values Education, vol. 3, No. 1, pp 97-105.
11. Swami, R. M. (1980), Education & Traditional Values Calcutta. The Ramkrishna Mission Institute of Calcutta.

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The primary objective of our recommendation system is to simplify the process of discovering books for users. In the competitive landscape of online book marketing, our system aims to stand out by offering personalized recommendations tailored to individual user preferences. By analyzing user activity such as purchases, browsing history, reviews, and likes, our system generates recommendations that align closely with each user’s tastes and interests. One of the key challenges we encountered in developing our system is ensuring that when a user makes a purchase, we can promptly suggest additional books that they are likely to enjoy. Given the vast array of options available to users, recommending the most suitable books poses a significant challenge. To address this challenge, we implemented a collaborative filtering approach based on the Pearson correlation coefficient. Collaborative filtering allows us to make recommendations by identifying similarities between users and items. By analyzing the purchasing behavior and preferences of similar users, we can predict which books a particular user might like based on the purchases and preferences of others with similar tastes.

 

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Book, Recommendation, Machine, Learning, Identify.

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  1. Adomavicius G. and Tuzhilin A. (2005) “Toward the next generation of recommender systems: A survey of the State-of-the-Art and Possible Extensions,” IEEE TransKnowl. Data Eng.,vol 17, no.6, pp 734-749.

2. Grover, N. (2019) “Enabling shift in retail using data: Case of Amazon, Iowa State University, Ames, Iowa.
3. Lakshmi, S.S. and Lakshmi, T.A. (2014). Recommendation Systems: Issues and challenges. (IJCSIT) International Journal of Computer Science and Information Technologies, Vol. 5 (4), 2014, 5771-5772.
4. Shani, G. and Gunawardana, A.  (2011) “Evaluating Recommendation Systems,” Springer, https://link.springer.com/chapter/10.1007/978-0-387-85820-3_8. Assess on 12/03/2024.

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इस वर्ष भारत के रक्षा क्षेत्र में रिकॉर्ड तोड़ा है। इस वर्ष पिछले वर्ष की तुलना में राशि रुपये 3,000.00 करोड़ से ज्यादा का रक्षा निर्यात हुआ है जिसमें बड़े शस्त्रों से लेकर छोटे उपकरण शामिल है, इसके अलावा रक्षा उत्पादन का भी रिकॉर्ड टूटा है। इस वर्ष एक लाख करोड़ रुपये का रक्षा उत्पादन हुआ है, इन दोनों आंकड़ों ने रिकॉर्ड तोड़े हैं। भारतीय रक्षा मंत्रालय ने बताया है कि इस वर्ष पूरी दुनिया से स्ब्। दृ तेजस, हल्के लड़ाकू हेलीकॉप्टर, एयरक्राफ्ट कैरियर और अन्य सामग्रीयों की मांग रही है। भारतीय सेना को आधुनिक बनाने के लिए आत्मनिर्भर अभियान के तहत ज्यादातर सामग्रीयों, हथियारों, उपकरणों को भारत में ही निर्माण पर जोर दिया जा रहा है। इससे भारत की सीमा सुरक्षा बढ़ी है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार वित्त वर्ष 2022-23 में करीबर राशि 16,000.00 करोड़ का रक्षा निर्यात हुआ है, यह पिछले वित्त वर्ष की तुलना में रुपये 3,000.00 करोड़ ज्यादा है, जबकि वर्ष 2016-17 की तुलना में 10 गुना ज्यादा है। भारत इस समय अमेरिका, इजराइल, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, इटली, जर्मनी समेत 85 से अधिक देशों को रक्षा उत्पादों का निर्यात कर रहा है। भारत ने पूरी दुनिया को दिखा दिया है कि कैसे उसकी डिजाइन, तकनीक और विकास का तरीका शानदार है। इस समय देश की 100 से ज्यादा कंपनियां रक्षा उत्पादों को दूसरे देशों में निर्यात कर रही है इनमें हथियार से लेकर विमान, मिसाइल से लेकर रॉकेट लांचर तक है।

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रक्षा उत्पादन, रक्षा निर्यात, स्वदेशी, मेक इन इंडिया, नवाचार प्रौद्योगिकी, आत्मनिर्भरता.

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  1. Defence Monitor, Vol.-12, Issue-3,Feb.-March 2024.

2. https://www.businesstoday.in, Assess on January, 08, 2024.
3. https://bhaskar.com, Assess on January, 03, 2024.
4. https://www.ddpmod.gov.in, Assess on January, 09, 2024.
5. https://defenceexam.gov.in, Assess on January, 09, 2024.
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10. https://www.thehindu.com, Assess on January, 10, 2024.

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नक्सलवाद एक विचारात्मक, राजनीतिक एवं आर्थिक संघर्ष है जो माओवाद एवं मार्क्सवाद के वर्ग संघर्ष पर आधारित है। वर्तमान समय में भी नक्सलवाद जैसी समस्या इसीलिए विद्यमान हैं क्योंकि पिछड़े एवं सुदूरवर्ती क्षेत्रों में सरकारी स्तर में ध्यान नहीं दिया जाता है तथा नक्सलवाद जैसी समस्या का समाधान पूर्ण रूप से सैनिक बल के द्वारा नही की जा सकती। आवश्यकता इस बात की हैं कि इन क्षेत्रों में शासन प्रशासन के जमीनी स्तर पर सरकारी योजनाओं के सही क्रियान्वयन और स्थानीय लोगों के साथ तालमेल स्थापित करनी होगी तभी नक्सलवादी समस्या को दूर किया जा सकता हैं।

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विचारात्मक, माओवाद, मार्क्सवाद, प्रशासन, नक्सलवाद, समाधान.

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  1. मोहती, मनोरंजन (1980), रिवोल्यूशनरी वाईलेन्स-ए स्टडी ऑफ माओइस्ट मूवमेंट इन इंडिया, नई दिल्ली, स्टेलिंग पब्लिशर्स।

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भूमि उपयोग भूमि का वह कार्य है जो मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति करता हैं। यह शोषण की प्रक्रिया है जिसमें मानव निरंतर भूमि का उपभोग करता है। प्रस्तुत शोध पत्र का मूल उद्देश्य अध्ययन क्षेत्र के भूमि उपयोग में होने वाले परिवर्तनों को जानना साथ ही इसका शोध प्रश्न 1991-2021 के दौरान अध्ययन क्षेत्र के भूमि उपयोग प्रारूप में कौन-कौन से परिवर्तन दृष्टिगत होती है, इसे समझना रहा है। इस अनुसंधान को पूरा करने के लिए द्वितीयक आँकड़ो और सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग किया गया है। द्वितीयक आँकड़ो में सरकारी, गैर - सरकारी कार्यालय से प्राप्त आंकड़े, साथ ही पुस्तक, जरनल, न्यूज़पेपर शामिल है। सांख्यिकीय विधियों में स्तरित प्रतिदर्श विधि को शामिल किया गया है, इसमें स्लोविन विधि के आधार पर 5 प्रतिशत मार्जिन के साथ स्तरिकृत यादृच्छिक विधि के माध्यम से 21 पंचायत के 21 गांवों में से 393 नमूना का चयन किया गया है। इसमें लैंडसेट 05 टीएम, लैंडसेट 08 ओएलआई, तथा धरातल पत्रक (मापनी 1ः50000) शामिल है साथ ही एराडास 14 और आर्क जी०आई०एस० 10.4 सॉफ्टवेयर के माध्यम से आंकड़ों का विश्लेशण और व्याख्या किया गया है। अध्ययन क्षेत्र में 1991 से 2021 के तीन दशकांे के दौरान वन भूमि, कृषि भूमि और जल निकाय क्रमशः 8.78 प्रतिशत, 3.02 प्रतिशत, 0.02 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई, जबकि निर्मित भूमि, खुली भूमि, झाड़ी भूमि और बंजर भूमि में वृद्धि देखा गया, जिसमें क्रमशः 5.47 प्रतिशत, 2.44 प्रतिशत, 1.25 प्रतिशत और 2.67 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई। इन परिवर्तनों का मौलिक कारण वनोन्मूलन, कृषि प्रारूप का बदलाव स्वरूप, जनसंख्या वृद्धि, आवासीय संरचना का विकास, सड़क निर्माण, आजीविका में बदलाव, ग्रामीण-शहरी प्रवास, वानिकी, सामाजिक-संास्कृतिक बनावट में परिवर्तन, संस्थागत विकास, शहरीकरण, ग्रामीण-शहरी उपांत और मानव जीवन शैली में बदलाव मुख्य है।

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 वन भूमि, कृषि भूमि, जल निकाय, भूमि.

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  1. चौनियाल, देवी दत्त (2021) “सुदूर संवेदन एवं भौगोलिक सूचना प्रणाली के सिद्धांत“ शारदा पुस्तक भवन प्रयागराज, पृ. 16,16-18, 107-118।

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6. रामानुज, अरूण कुमार (2019) “झारखण्ड मंे कृषि के बदलते स्वरूप“ राजेश पब्लिकेशन, दरियागंज न्यू दिल्ली, पृ. 39-76।
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9. मंडल, आर.बी. (1990) “लैंड यूटिलाइजेशन थ्यिोरी एण्ड पै्रक्टीस“ कांसेप्ट पब्लिशिंग कंपनी, न्यू दिल्ली,       पृ. 01-43।
10. ब्लाश, विडाल डी. ला. (1959) “ प्रिंसिपल ऑफ ह्यूम्न ज्योग्राफी“, H. Holt and company, 1926“the University of Michigan, पृ. 75।
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केदारनाथ सिंह समकालीन कविता में एक प्रतिष्ठित कवि हैं। उनका समय हमें उनके काव्य सृजन में प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देता है। पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच के कवि हैं केदारनाथ सिंह। प्राकृतिक बिंबो ने उनके काव्य में जो स्थान पाया है और जितनी सहजता से पाया है उतना सरल और सरस चित्रण हिंदी काव्य जगत की एक दुर्लभ संपत्ति है। केदारनाथ सिंह की कविता में जीवन और जगत से जुड़े हुए अनेक पहलुओं को प्रकृति के संदेश और प्रकृति सौंदर्य के माध्यम से समझाया गया है। केदारनाथ सिंह ने अपने काव्य को किसी अन्य काव्य की चेतना से प्रभावित होने से बचाया है। यदि वह चाहते तो छायावादी कवियों की तरह प्रकृति का अलंकारिक चित्रण कर सकते थे, क्योंकि वह जीवन से जुड़े कवि हैं, इसलिए उनकी कविता में प्रकृति चित्रण के माध्यम से एक जीवंत समस्या और उस समस्या से लड़ने का साहस भी हम देख सकते हैं।

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लोक, पर्यावरण, संवेदना, पूंजीवाद, संरक्षण, संस्कृतिण्

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 1. सिंह, केदारनाथ (1999) उत्तर कबीर एवं अन्य रचनाएँ, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली 02, प्रथम संस्करण, पृ-34।

2. सिंह, केदारनाथ (1983) यहाँ से देखो,  राधाकृष्ण प्रकाशन, 2 अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली 02, प्रथम संस्करण, पृ. 41।
3. hindisamay.com (अडियल साँस) Assess on 28 February  2024
4. hindisamay.com (अकाल में सारस) Assess on 2 March 2024
5. hi.m.wikibooks.org (पानी की प्रार्थना) Assess on 28 February  2024
6. hindisamay.com (अकाल में दूब) Assess on 2 March 2024
7. hindisamay.com (यह पृथ्वी रहेगी) Assess on 2 March 2024

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India is a multicultural and multilingual nation. This diversity poses many challenges. With the outbreak of deadly Novel Corona virus, the entire world has been shaken. Even today, many of us are not aware of the difference between epidemic and pandemic, lockdown and shutdown. We are coming to terms with what is quarantine, what is asymptomatic. So the need of the hour is to inform and educate the masses, especially the rural population on the seriousness of Covid-19. And what better way than by entertainment through their own people and not someone who is elitist or suited-booted? Folk media is the way to meet the challenges of Covid-19. Effective use of folk media can create awareness, provide information and bring about desired attitudinal changes and behavioral changes among populations. Far from being stagnant, Folk media are highly flexible and adapt to changing times and are supportive of Health Communication. The research paper aims to look at the changing contours of folk media in the current scenario and suggests ways for folk media to meet the challenges faced today. The role of the communicator is also looked at.

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Folk media, information, Covid-19, Health Communication.

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  1. Melkote, Srinivas R., Steeves Leslie H. (2009) Communication for Development in the Third World. Theory and Practice for Empowerment. Sage Publications. New Delhi. 

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5. Madhusudan, K. (2006) Traditional Media and Development Communication. Kanishka Publishers. New Delhi.
6. https://covid19.who.int/ Assessed on 3 March, 2024.

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कृषि मानव का प्रमुख आधार है। कृषि विकास में सिंचाई का अपना विशेष स्थान है। प्रस्तुत अध्ययन क्षेत्र पलामू जिले का पांकी प्रखंड है। प्रस्तुत शोध पत्र का प्रमुख उद्देश्य कृषि विकास में सिंचाई की भूमिका को स्पष्ट करना साथ ही सिंचाई के साधनों का पता लगाना है। इस पत्र को पूरा करने के लिए प्राथमिक एवं द्वितियक आंकड़ों का सहारा लिया गया है। इस पत्र में प्रखंड के 20 पंचायत के अंतर्गत प्रमुख सिंचाई साधनों का पता लगाया गया तथा प्रमुख सिंचाई विधि के बारे में अध्ययन किया गया। यहां कुआँ, नलकूप, तालाब, डोभा तथा नदियों के बांध बनाकर सिंचाई की जाती है।

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कुआँ, तालाब, नलकूप टैंक सिंचाई, ड्रिप सिंचाई, फव्वारा सिंचाई, कृषि.

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  1. हुसैन, मजिद (2016) ’’कृषि भूगोल’’ रावत पब्लिकेशन, जयपुर।

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प्रस्तुत शोध पत्र ‘‘ग्रामीण एवं शहरी माध्यमिक स्तर के छात्र-छात्राओं की शैक्षिक उपलब्धि पर उनके पर्यावरणीय वातावरण के प्रभाव का अध्ययन’’ पर आधारित है। शोध के निम्नलिखित उद्देश्य हैं- ग्रामीण माध्यमिक स्तर के छात्र-छात्राओं की शैक्षिक उपलब्धि पर उनके पर्यावरणीय वातावरण के प्रभाव का अध्ययन करना। शहरी माध्यमिक स्तर के छात्र-छात्राओं की शैक्षिक उपलब्धि पर उनके पर्यावरणीय वातावरण के प्रभाव का अध्ययन करना। अनुसंधान में प्रयुक्त समस्या की स्पष्ट व्याख्या हेतु शोधकर्ता ने सर्वेक्षण विधि का प्रयोग किया है। न्यादर्श :शोधार्थी द्वारा मध्यप्रदेश के दतिया जिले के 2 ग्रामीण एवं 2 शहरी माध्यमिक विद्यालय के 20 शहरी एवं 20 ग्रामीण छात्र-छात्राओं का चयन किया है। प्रस्तुत शोध में उद्देश्यों को दृष्टिगत रखते हुये शोधार्थी द्वारा छात्र-छात्राओं की शैक्षिक उपलब्धि के लिए उनके पिछले वर्ष का परीक्षा परिणाम लिया गया तथा पर्यावरण के लिए प्रमाणीकृत उपकरण के रूप में प्रवीण कुमार झा द्वारा निर्मित पर्यावरण जागरूकता अभिक्षमता मापनी का प्रयोग किया गया। निष्कर्ष रूप में पाया गया कि ग्रामीण माध्यमिक स्तर के छात्र-छात्राओं की शैक्षिक उपलब्धि पर उनके पर्यावरणीय वातावरण का सार्थक प्रभाव पड़ता है। शहरी माध्यमिक स्तर के छात्र-छात्राओं की शैक्षिक उपलब्धि पर उनके पर्यावरणीय वातावरण का सार्थक प्रभाव पड़ता है।

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ग्रामीण एवं शहरी माध्यमिक स्तर के छात्र-छात्रा, शैक्षिक उपलब्धि, पर्यावरणीय वातावरण.

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  1. अग्रवाल, पी.के. (1993), ‘‘पर्यावरण एवं नदी प्रदूषण’’ आशीष पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली।

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3. चौधरी, रेनू (2007), ‘‘पर्यावरण अध्ययन एवं शिक्षण’’ ज्ञान भारती प्रकाशन न्यू कॉलोनी, जयपुर।
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5. भटनागर, सुरेश (1991). ‘‘शिक्षा मनोविज्ञान’’, अटलान्टिक पब्लिशर्स, दिल्ली।
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प्रस्तुत शोध पत्र ‘‘ग्वालियर के शासकीय एवं अशासकीय माध्यमिक स्तर के योग न करने वाले एवं योग करने वाले विद्यार्थियों की उपलब्धि पर योग के प्रभाव का तुलनात्मक अध्ययन’’ पर आधारित है। प्रस्तुत शोध में योगाभ्यास न करने वाले (नियंत्रित समूह) एवं योगाभ्यास करने वाले (प्रयोगात्मक समूह) समूहों के शासकीय एवं अशासकीय माध्यमिक विद्यालय के विद्यार्थियों की उपलब्धि परीक्षण सम्बन्धी तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। शोध के निम्नलिखित उद्देश्य हैं -शासकीय एवं अशासकीय माध्यमिक स्तर के योग न करने वाले एवं योग करने वाले छात्र-छात्राओं की उपलब्धि पर योग के प्रभाव का तुलनात्मक अध्ययन करना। शोधकर्ता ने सर्वेक्षण विधि का प्रयोग किया है तथा न्यादर्श के लिए शोधार्थी द्वारा मध्यप्रदेश के ग्वालियर मुख्यालय के 2 शासकीय एवं 2 अशासकीय माध्यमिक विद्यालय के 20 (10 छात्र $ 10 छात्रायें शासकीय) एवं 20 (10 छात्र $ 10 छात्रायें अशासकीय) विद्यार्थियों का चयन किया है। विद्यार्थियों में योगाभ्यास न करने वाले (नियंत्रित समूह) के 5-5 छात्र-छात्राओं एवं योगाभ्यास करने वाले (प्रयोगात्मक समूह) के 5-5 छात्र-छात्राओं को शासकीय एवं अशासकीय माध्यमिक विद्यालय से चयनित किया गया है। शोध उपकरण के रूप में शोधार्थी द्वारा विद्यार्थियों की उपलब्धि पर योग के प्रभाव के लिए स्व-निर्मित प्रश्नावली का प्रयोग किया गया है। निष्कर्ष में पाया गया कि शासकीय एवं अशासकीय माध्यमिक स्तर के योग न करने वाले एवं योग करने वाले छात्र-छात्राओं की उपलब्धि पर तुलनात्मक रूप से योग का सार्थक प्रभाव पड़ता है।

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योग, उपलब्धि, विद्यार्थी, माध्यमिक स्तर.

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  1. महाजन, धर्मवीर एवं महाजन, कमलेश (2003) सामाजिक अनुसंधान की पद्धतियां, विवेक प्रकाशन, दिल्ली 

2. सरस्वती स्वामी निरन्जनानन्द, (1999) धारणा दर्शन प्रकाशक, योग पब्लिकेशन्स ट्रस्ट, मुंगेर, बिहार।
3. श्रेयस, प्रज्ञा समणी (2014) जीवन विज्ञान का आध्यात्मिक एवं मनोविज्ञानिक आधार प्रकाशक, जैन विश्वभारती लाडूनं, राजस्थान।
4. भटनागर, ए.बी. तथा मीनाक्षी (2003), मनोविज्ञान एवं शिक्षा के मापन एवं मूल्यांकन, सूर्या प्रकाशन, मेरठ।

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प्रस्तुत शोध पत्र में हजारीबाग जिले के अंर्तगत विष्णुगढ़ प्रखंड के आर्थिक क्रियाकलाप को शामिल किया गया है। इस शोध पत्र का मुख्य उद्देश्य अध्ययन क्षेत्र में मानवीय क्रियाकलाप के स्वरूप को जानना है। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए प्राथमिक एवं द्वितीयक आँकड़ों का सहारा लिया गया है। प्राथमिक आँकड़ों के अंर्तगत अवलोकन और साक्षात्कार विधि का प्रयोग किया गया है। द्वितीयक आँकड़ों के अंर्तगत सरकारी और गैर-सरकारी विधि का प्रयोग किया गया है। इस पत्र के माध्यम से यह स्पष्ट पता चलता है कि अध्ययन क्षेत्र में प्राथमिक क्रिया, द्वितीयक क्रिया, तृतीयक क्रिया एवं चतुर्थक क्रिया देखने को मिलता है जिसमें मूलतः कृषि कार्य, कुटीर उद्योग, सोहराय पेंटिंग, निर्माण कार्य, क्लाउड किचन, मजदूरी शामिल है। अध्ययन क्षेत्र में कृषक वर्ग 48.10 प्रतिशत, कृषि श्रमिक 30.57 प्रतिशत, गृहस्थी उद्योग में 3.01 प्रतिशत एवं अन्य श्रमिक 18.32 प्रतिशत जनसंख्या शामिल है। अध्ययन क्षेत्र के इन आर्थिक क्रियाकलाप को प्राकृतिक संसाधन, मानव संसाधन विकास, पूंजी निर्माण, तकनीकी उन्नति, जनसंख्या में वृद्धि, सामाजिक लागतें, मनोवैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक कारक और कृषि का मशीनीकरण शामिल है।

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कृषि कार्य, कुटीर उद्योग, सोहराय पेंटिंग, निर्माण कार्य, मजदूरी, सेवा कार्यण्

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  1. मौर्य, एस. डी. (2018), ’’आर्थिक भूगोल’’ प्रवालिका पब्लिकेशन्स, यूनिवर्सिटी रोड़, इलाहाबाद, 211002.

2. ठाकुर, दीनानाथ और कुमारी सरिता (2018), ’’कृषि भूगोल’’ राजेश पब्लिकेशन, अंसारी रोड़, दरियागंज, नई दिल्ली-110002.
3. रामानुज, अरूण कुमार (2019), ’’झारखण्ड में कृषि के बदलते स्वरूप’’ राजेश पब्लिकेशन्स, दरियागंज, नई दिल्ली-110002.
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A person’s personality is developed and shaped by their sex education, which is a crucial aspect of who they are. It enables people to make wiser choices by adopting a logical mindset as opposed to acting on instinct. One of the primary issues facing India is the lack of sex education and healthy dialogue surrounding sexual behaviours, for which we are still not doing enough. A sophisticated sexual assault education programme would directly reduce the number of sexual assault cases while also bringing about a variety of other good effects. This essay examines the ways in which India’s nearly non-existent sex education programme has been shaped by a number of variables. It also emphasises the growing necessity of educating young people about their online behaviour in the digital age. To understand the political, social, technological, and legal factors influencing the numerous study issues, the paper use PESTLE analysis. It talks about how India’s sociocultural values have influenced the country’s sex education curriculum. When putting sex education plans into practise, a lot of political actors and factors enter the picture. Even now, a sizable portion of political elites remain sceptical about the idea of supplying such knowledge through the official school system. However, we cannot ignore the fact that digital media is becoming more and more popular among this generation’s kids. Therefore, we have to concentrate on keeping it secure and cosy for each and every user. The essay also addresses the potential legal ramifications of engaging in unethical and consensual sexual behaviour, with a particular emphasis on the internet.

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Sex Education, Digital Era, Formal Education System, Political Factors, Socio-cultural beliefs, Legal Repercussions.

Read Reference

  1. Ameilagettleman. Sex education angers Indian Conservatives. New York Times, 24th May, 2007. http://www.nytimes.com/2007/05/24/world/asia/24ihtletter.1.5851113. html [Last accessed on 28.8.2016]

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December To February
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Monetary execution is a vital element that decides a company’s productivity, long haul dependability, liquidity and is likewise a significance part of monetary gamble the executives. The appraisal of monetary execution can be accomplished by utilizing similar accounting report and benefit and misfortune examination, proportion investigation, pattern examination and so on. Monetary outcomes might be utilized to survey an organization’s prosperity.India, with a development pace of 6.6 percent in the year 2022, is among the quickest developing economies in Asia. Producing area and agrarian areas possesses second and third spot as far as commitment to Gross domestic product separately. The vehicle business assumes a fundamental part in Indian economy in India with regards to work age, creation and deals. Vehicle area a vital driver of macroeconomic development. Progress of any association relies upon principally on administration of its money effectively; along these lines monetary execution assessment is assumes essential part. The point of the paper is to assess the monetary exhibition of select Auto Organizations utilizing proportions. The review is work area exploration and it depends on the optional information gathered yearly reports for a considerable length of time 2016-17 to 2020-21. The number of inhabitants in the review contains top 10 vehicle organizations recorded in BSE Ltd. as on 31-12-2021. The specialist has picked top three organizations based on turnover. The example organizations are Tata Motors Ltd and Mahindra & Mahindra Ltd. The extent of the review is restricted to the select organizations which are from four wheel passengers  vehicles as it were. The information gathered for study were broke down utilizing proportion investigation and EVA examination. It is found that on a generally the monetary execution of select example vehicle organizations were in a sluggish speed, however Tata Motors Ltd and Mahindra & Mahindra Ltd. were steady and better in their monetary execution.

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Finance, Performance, Evaluation, Automobile, Tata Motors Ltd, Mahindra & Mahindra Ltd.

Read Reference

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हिन्दी भाषा का प्रसार विश्व में जनसंख्या की दृष्टि से चौथे एवं भौगोलिक क्षेत्रफल की दृष्टि से दूसरे स्थान पर है। भारत में मूलतः हिन्दी बोलने, लिखने और समझने वाले लोग मुख्य रूप से मध्य भाग, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तराखण्ड, झारखण्ड, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली में पूर्णतः और आस-पास के लोग हुए लगभग सभी प्रदेशों में थोड़ी बहुत बोली-लिखी और समझी जाती है। वैसे तो पूरे भारत में समझी और प्रयोग में लायी जाती है। यही प्रदेश (दिल्ली को छोड़कर) किसान बाहुल्य प्रदेश भी है। हिन्दी यही पर पली और बढ़ी है। इन्हें हिन्दी भाषा प्रदेश भी कहा जाता है।

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हिंदी साहित्य, भाषा, किसान.

Read Reference

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5. शर्मा रामविलास, (2016) प्रेमचन्द और उनका युग भूमिका, राज कमल  प्रकाशन, दरिया गंज, नयी दिल्ली, पृष्ठ 74, 98। 
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Health is considered as an essential resource for everyday life. It is better to promote social and personal resources as well as physical capabilities. Good health is an essential ingredient, which contributes to people’s wellbeing and country’s economic growth. The good health is not only free of diseases, but also is stress less mind, fit body, and social well-being. As per WHO report 80% of diseases are caused by lack of sanitation, poor hygiene, unclean drinking water and dirty water use for cooking and washing, etc. To measure the health status, we take few parameters like life expectancy, fertility rate, birth rate, communicable and non-communicable diseases, etc. The health status in Jharkhand has got positive betterment compared to the previous years. But still in few health status indicators the state needs to improve. However, the limitation of required adequate infrastructure restricts the situation. So, the required adequate health infrastructures and health human resources will exist as challenges for the Government of Jharkhand. 

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Health Status, Health Services, Health Infrastructure, Morbidity, Common Disease, Human Resources of Health.

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 Note

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Report
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The action programmes of the Voluntary Organizations (VOs) relate to community organization, community health, education, natural resource management, skill development and income generation. The Problems of VOs relate to funding, one-manship in decision making, unattractive service conditions of paid staff and apathy of bureaucracy. There is an urgent need to promote and strengthen voluntary action. Some of the suggestions for improvement of VOs may be demonstration of genuine commitment of leadership to treat VOs as partners, extension oriented promotive style of functioning of the bureaucracy, simplification of grants-in-aid procedure, setting up a networking mechanism among the VOs, training of personnel and improving the organizational structure and administrative competence of the voluntary organizations. The role of voluntary organizations in sustainable development of the nation is considered vital because VOs have first hand knowledge and experience of people’s needs and available resources at the grass-roots level. VOs have closer contact with the people. VOs are flexible in nature in contrast to rigid bureaucratic system. Voluntary action is far more cost effective than an elaborate bureaucratic set-up.

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Voluntary Organization, Sustainable Development, Organizations.

Read Reference

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सूचना प्रौद्योगिकी (Information Technology) आँकड़ों की प्राप्ति, सूचना संग्रह, सुरक्षा, परिवर्तन, आंकड़ो का आदान-प्रदान, अध्ययन, डिजाइन आदि कार्याे तथा इन कार्याे के निष्पादन के लिए आवश्यक कम्प्यूटर हार्डवेयर अनुपयोगों से संबंधित है। सूचना प्रौद्योगिकी, वर्ममान समय में वाणिज्य-व्यापार का अभिन्न अंग है। संचार क्रान्ति के फलस्वरूप, दुर-संचार को भी सूचना प्रौद्योगिकी का एक प्रमुख घटक माना जाता है। इसे सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) कहा जाता है। सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के विकास तथा ग्रामीण भारत के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। ग्रामीण विकास, भारत सरकार की एक महत्वपूर्ण कार्य सूची है। ग्रामीण विकास क्षेत्र में सूचना व संचार प्रौद्योगिकी का उपयोग धीमा रहा है। इसके मुख्य कारण ग्रामीण इलाकों में खराब सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी बुनियादी ढ़ाचा है। ग्रामीण इलाकों में काम कर रहे संस्था/अधिकारी और स्थानीय भाषा के मुद्दों के बीच सूचना एवं संचार प्रौद्यागिकी की खराब जानकारी है। ग्रामीण इलाकों में रह रहे कुुल भारतीय जनसंख्या के 70 प्रतिशत आबादी कृषि क्षेत्र पर निर्भर है। कृषि क्षेत्र में उत्पादन वृद्धि के लिए प्रौद्योगिकी हस्तांतरण महत्वपूर्ण है और क्षेत्र में सूचना प्रौद्योगिकी की महत्वपूर्ण भूमिका है। सूचना प्रौद्योगिकी न केवल तेजी से विस्तार के लिए आवश्यक है, बल्कि इसके उपयोग से विभिन्न कृषि कार्याे को जल्दी से आसान तरीक से किया जा सकता है। कृषि उत्पादकों की बढ़ती मांग, उत्पादकों को अपनी आजीविका बनाए रखने और सुधारने के लिए अवसर करती है। सूचना व संचार प्रौद्योगिकी इन चुनौतियों को संबोधित करने एवं ग्रामीण गरीबी की आजीविका का उत्थान करने मे एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। 

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 ग्रामीण विकास, सूचना व संचार प्रौद्योगिकी, दुर-संचार.

Read Reference

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